Sunday, 14 May 2017


चन्द्रगुप्त मौर्य का इतिहास – Chandragupta Maurya History in Hindi

चन्द्रगुप्त मौर्य मौर्य साम्राज्य के संस्थापक थे और वे पुरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल रहे। चन्द्रगुप्त मौर्य के राज्यारोहण की तिथि साधारणतः 324 ईसा पूर्व की मानी जाती है, उन्होंने लगभग 24 सालो तक शासन किया और इस प्रकार उनके शासन का अंत प्रायः 297 ईसा पूर्व में हुआ। बाद में 297 में उनके पुत्र बिन्दुसार ने उनके साम्राज्य को संभाला। मौर्य साम्राज्य को इतिहास के सबसे सशक्त सम्राज्यो में से एक माना जाता है। अपने साम्राज्य के अंत में चन्द्रगुप्त को तमिलनाडु (चेरा, प्रारंभिक चोला और पंड्यां साम्राज्य) और वर्तमान ओडिसा (कलिंग) को छोड़कर सभी भारतीय उपमहाद्वीपो पर शासन करने में सफलता भी मिली। उनका साम्राज्य पूर्व में बंगाल से अफगानिस्तान और बलोचिस्तान तक और पश्चिम के पकिस्तान से हिमालय और कश्मीर के उत्तरी भाग में फैला हुआ था। और साथ ही दक्षिण में प्लैटॉ तक विस्तृत था। भारतीय इतिहास में चन्द्रगुप्त मौर्य के शासनकाल को सबसे विशाल शासन माना जाता है।

ग्रीक और लैटिन खातो के अनुसार चन्द्रगुप्त सैंड्रोकोटॉ (Sandrocottos) और अन्ड्रोकोटॉ (Androcottos) के नाम से भी जाने जाते है। चन्द्रगुप्त ने अलेक्ज़ेण्डर द ग्रेट के युनानी सुदूर पूर्वी शासन काल को भी निर्मित किया और अलेक्ज़ेण्डर के सबसे शक्तिशाली शासक सेलुकस प्रथम निकटोर को युद्ध में पराजीत किया। और परिणामस्वरूप गठबंधन के इरादे से चंदगुप्त ने सेलुकस की बेटी से मित्रता की भावना से विवाह कर लिया ताकि वे सशक्त साम्राज्य का निर्माण कर सके और युनानी साम्राज्य से अपनी मित्रता को आगे बढा सके। इसके चलते भारत का पश्चिमी देशो से सम्बन्ध निर्मित होता गया और आसानी से भारतीय पश्चिमी देशो से व्यापार भी करने लगे। बाद में ग्रीक राजनीतिज्ञ मेगस्टेन्स ने मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र को भेट दी, जो उस समय मौर्य साम्राज्य का मुख्य अंग था।

ज्यादातर भारत को एक करने के बाद चन्द्रगुप्त और उनके मुख्य सलाहकार चाणक्य ने आर्थिक और सामाजिक बदलाव किये। उन्होंने भारत की आर्थिक और राजनैतिक स्थिति में भी सुधार किये। और चाणक्य के अर्थशास्त्र को ध्यान में रखते हुए राजनैतिक सुधार करने हेतु केंद्रीय प्रशासन की स्थापना की गयी। चन्द्रगुप्त कालीन भारत को प्रभावशाली और नौकरशाही की प्रणाली अपनाने वाले भारत के रूप में जाना जाता है जिसमे सिविल सेवाओं पर ज्यादा से ज्यादा जोर दिया गया था। चन्द्रगुप्त के साम्राज्य में एकता होने की वजह से ही उनकी आर्थिक स्थिति सबसे मजबूत मानी जाने लगी थी। और विदेशो में व्यापार होने के साथ ही देश का आंतरिक और बाहरी विकास भी होने लगा था।

कला और शिल्पकला दोनों के ही विकास में मौर्य साम्राज्य का बहोत बडा योगदान रहा है। अपनी प्राचीन संस्कृति को आगे बढाने की सिख कुनबे अकियाई साम्राज्य और युनानी साम्राज्य से ही मिली। चन्द्रगुप्त के शासनकाल में धार्मिक गुरुओं को भी काफी महत्त्व दिया गया था। उनके साम्राज्य में बुद्ध और जैन समाज का तेज़ी से विकास हो रहा था। जैन खातो के अनुसार चन्द्रगुप्त ने अपने सिंहासन को स्वैच्छा से छोड़ा था क्यू की ऐसा कहा जाता है की उनके पुत्र बिन्दुसार ने जैन धर्म का आलिंगन कर लिया था और उनका पुत्र दक्षिणी साधु भद्राभाऊ का अनुयाई बन गया था। कहा जाता है की श्रवणबेलगोला (अभी का कर्नाटक) में अपनी इच्छा नुसार ही भुखमरी से ही उनकी मृत्यु हुई थी।

चन्द्रगुप्त मौर्य का प्रारंभिक जीवन कहानी – Chandragupta Maurya Ki Kahani in Hindi

चन्द्रगुप्त के युवा जीवन और वंशज के बारे में बहोत कम जानकारी उपलब्ध है। उनके जीवन के बारे में जो भी जानकारी उपलब्ध है वो सारी जानकारी संस्कृत साहित्य और ग्रीक और लैटिन भाषाओं में से जो चन्द्रगुप्त के ही अँड्रॉटोस और सैंड्रोकोटॉ नाम पर है में से ली गयी है। बहोत से पारंपरिक भारतीय साहित्यकारों ने मौर्य का सम्बन्ध नंदा राजवंश से भी बताया है जो की आधुनिक भारत में बिहार के नाम से भी जाना जाता है।

बाद में हज़ारो साल बाद एक संस्कृत नाटक मुद्राराक्षस में उन्हें “नंदनवय” मतलब नंद के वंशज भी कहा गया था। चन्द्रगुप्त का जन्म उनके पिता के छोड़ चले जाने के बाद एक बदहाल परिवार में हुआ था, कहा जाता है की उनके पिता मौर्य की सरहदों के मुख्य प्रवासी थे। चन्द्रगुप्त की जाती के बारे में यदि बात की जाये तो मुद्राराक्षस में उन्हें कुल-हीन और वृषाला भी कहा गया है। भारतेंदु हरीशचंद्र के अनुवाद के अनुसार उनके पिता नंद के राजा महानंदा और उनकी माता मोरा थी, इसी वजह से उनका उपनाम मौर्य पड़ा। जस्टिन ने यह दावा किया था की चन्द्रगुप्त एक नम्र प्रवृत्ति के शासक थे। वही दूसरी ओर नंद को प्रथित-कुल मतलब प्रसिद्ध और खानदानी कहा

सूर्यवंशी मौर्य क्षत्रिय राजपूत वंश की गौरव गाथा एवं इतिहास -------
मौर्य वंश से जुडी भ्रांतियों का तर्कपूर्ण खण्डन-जरूर पढ़ें और अधिक से अधिक शेयर भी करें।।
मौर्यो के रघुवंशी क्षत्रिय होने के प्रमाण--
महात्मा बुध का वंश शाक्य गौतम वंश था जो सूर्यवंशी क्षत्रिय थे।कौशल नरेश प्रसेनजित के पुत्र विभग्ग ने शाक्य क्षत्रियो पर हमला किया उसके
बाद इनकी एक शाखा पिप्लिवन में जाकर रहने लगी। वहां मोर पक्षी की अधिकता के कारण मोरिय कहलाने लगी।
बौद्ध रचनाओं में कहा गया है कि ‘नंदिन’(नंदवंश) के कुल का कोई पता नहीं चलता (अनात कुल) और चंद्रगुप्त को असंदिग्ध रूप से अभिजात कुल का बताया गया है।
चंद्रगुप्त के बारे में कहा गया है कि वह मोरिय नामक क्षत्रिय जाति की संतान था; मोरिय जाति शाक्यों की उस उच्च तथा पवित्र जाति की एक शाखा थी, जिसमें महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ था जिनके पूर्वज रामचंद्र जी थे। कथा के अनुसार, जब अत्याचारी कोसल नरेश विडूडभ ने शाक्यों पर आक्रमण किया तब मोरिय अपनी मूल बिरादरी से अलग हो गए और उन्होंने हिमालय के एक सुरक्षित स्थान में जाकर शरण ली। यह प्रदेश मोरों के लिए प्रसिद्ध था, जिस कारण वहाँ आकर बस जाने वाले ये लोग मोरिय कहलाने लगे, जिनका अर्थ है मोरों के स्थान के निवासी। मोरिय शब्द ‘मोर’ से निकला है, जो संस्कृत के मयूर शब्द का पालि पर्याय है।
एक और कहानी भी है जिसमें मोरिय नगर नामक एक स्थान का उल्लेख मिलता है। इस शहर का नाम मोरिय नगर इसलिए रखा गया था कि वहाँ की इमारतें मोर की गर्दन के रंग की ईंटों की बनी हुई थीं। जिन शाक्य गौतम क्षत्रियों ने इस नगर का निर्माण किया था, वे मोरिय कहलाए।
महाबोधिवंस में कहा गया है कि ‘कुमार’ चंद्रगुप्त, जिसका जन्म राजाओं के कुल में हुआ था (नरिंद-कुलसंभव), जो मोरिय नगर का निवासी था, जिसका निर्माण साक्यपुत्तों ने किया था, चाणक्य नामक ब्राह्मण (द्विज) की सहायता से पाटलिपुत्र का राजा बना।
महाबोधिवंस में यह भी कहा गया है कि ‘चंद्रगुप्त का जन्म क्षत्रियों के मोरिय नामक वंश में’ हुआ था (मोरियनं खत्तियनं वंसे जातं)। बौद्धों के दीघ निकाय नामक ग्रन्थ में पिप्पलिवन में रहने वाले मोरिय नामक एक क्षत्रिय वंश का उल्लेख मिलता है। दिव्यावदान में बिन्दुसार (चंद्रगुप्त के पुत्र) के बारे में कहा गया है कि उसका क्षत्रिय राजा के रूप में विधिवत अभिषेक हुआ था (क्षत्रिय-मूर्धाभिषिक्त) और अशोक (चंद्रगुप्त के पौत्र) को क्षत्रिय कहा गया है।
मौर्यो के 1000 हजार साल बाद विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस ग्रन्थ लिखा। जिसमे चन्द्रगुप्त को वृषल लिखा।
वर्षल का अर्थ आज तक कोई सही सही नही बता पाया पर हो सकता है जो अभिजात्य न हो।
चन्द्रगुप्त क्षत्रिय था पर अभिजात्य नही था एक छोटे से गांव के मुखिया का पुत्र था।
अब इस ग्रन्थ को लिखने के भी 700 साल बाद यानि अब से सिर्फ 300 साल पहले किसी ढुंढिराज ने इस पर एक टीका लिखी जिसमे मनगढंत कहानी लिखकर उसे शूद्र बना दिया।
यही से यह गलतफैमी फैली।
जबकि हजारो साल पुराने भविष्य पुराण में लिखा है कि मौर्यो ने विष्णुगुप्त ब्राह्मण की मदद से नन्दवंशी शूद्रो का शासन समाप्त कर पुन क्षत्रियो की प्रतिष्ठा स्थापित की।
दो हजार साल पुराने बौद्ध और जैन ग्रन्थ और पुराण जो पण्डो ने लिखे उन सबमे मौर्यो को क्षत्रिय लिखा है।
1300 साल पुराने जैन ग्रन्थ कुमारपाल प्रबन्ध में चित्रांगद मौर्य को रघुवंशी क्षत्रिय लिखा है।
महापरिनिव्वानसुत में लिखा है कि महात्मा बुद्ध के देहावसान के समय सबसे बाद मे पिप्पलिवन के मौर्य आए ,उन्होंने भी खुद को शाक्य वंशी गौतम क्षत्रिय बताकर बुद्ध के शरीर के अवशेष मांगे,
एक पुराण के अनुसार इच्छवाकु वंशी मान्धाता के अनुज मांधात्री से मौर्य वंश की उतपत्ति हुई है।
इतने प्रमाण होने और आज भी राजपूतो में मौर्य वंश का प्रचलन होने के बावजूद सिर्फ 200-300 साल पुराने ग्रन्थ के आधार पर कुछ मूर्ख मौर्यो को शूद्र घोषित कर देते हैं।
सबने मौखिक सुनकर रट लिया कि पुराणों में मौर्यो को शूद्र लिखा है पर किस पुराण में और किस पृष्ठ पर ये नही देखा।
हर ऑथेंटिक पुराण में मौर्य को क्षत्रिय सत्ता दोबारा स्थापित करने वाला वंश लिखा है
वायु पुराण विष्णु पुराण भागवत पुराण मत्स्य पुराण सबमें मौर्य वंश को सूर्यवँशी क्षत्रिय लिखा है।।
मत्स्य पुराण के अध्याय 272 में यह कहा गया है की दस मौर्य भारत पर शासन करेंगे और जिनकी जगह शुंगों द्वारा ली जाएगी और शतधन्व इन दस में से पहला मौरिया(मौर्य) होगा।
विष्णु पुराण की पुस्तक चार, अध्याय 4 में यह कहा गया है की "सूर्य वंश में मरू नाम का एक राजा था जो अपनी योग साधना की शक्ति से अभी तक हिमालय में एक कलाप नाम के गाँव में रह रहा होगा" और जो "भविष्य में क्षत्रिय जाती की

Real history of Maurya

#मौर्य_____________

#मैं बताना चाहूँगा बुद्ध और उनके वंश को तथा #घृणा की राजनीती करने वाले लोगो के उस तथ्य #को जिसको बेबुनियाद ये गालिया बकते है।

#ऋषि कश्यप के वंशज मनुस्मृति वाले मनु #महाराज थे, राम ,लक्ष्मण थे।

#इसी सूर्यवंश में शाक्य के शुद्योधन थे जिनके पुत्र #थे ।

#भगवान बुद्ध , वस्तुतः मनुस्मृति वाले मनु से #लेकर बुद्ध तक सभी एक ही शृंखला सूर्यवंश के #थे। जबकि गालिया खाते है ब्राह्मण , जो की #घोर अज्ञानता का परिचायक है मनुस्मृति के #रचना कार स्वयं बुद्ध के पूर्वज थे और मनुस्मृति #के लिए मनु को गालिया बकने वाले आधुनिक #बौद्ध वादी , क्या इनको वास्तव में इतिहास का पता है क्या ये वास्तव में तथ्यों और ऐतिहासिक परिदृश्यों पर सच्चा अध्ययन करते है ।

सायद नही आगर ऐसा होता तो आज स्वयं को बुद्ध का अनुवाई बताने वाले बुद्ध के ही पूर्वजो को गालिया नही बकते।

इतना ही नही ये गालिया बकने वाले लोगो से पूछिये वास्तव में इन्होंने बुद्ध और उनके धर्म के लिए क्या किया है तो भर से भाग खड़े होंगे और जो खड़े होंगे बोलने वाले वो भक से भीम राव का नाम लेंगे और कहेंगे बाबा के बौद्ध धर्म को जिंन्दा किया। जबकि ऐसा नही बाबा ने बौद्ध धर्म में परिवर्तन किया और उसे स्वयं के अनुकूल बना कर विकृत किया। जिसे जीर्णोद्धार नही हाइजैक कहते है। भीम राव ने बुद्ध को नीज स्वार्थ पूर्ति के लिए हाइजैक किया। इस हाइजैक महिमामंडित करना की बाबा ने बुद्ध और उनके धर्म पर उपकार किया घोर मूर्खता का सबूत है।

#जबकि वास्तव में बुद्ध और उनके धर्म के लिए #जिन्होंने किया वो आज गालिया खाते है ,

#बुद्ध का धर्म वेद सम्मत और सनातन धर्म के #शुद्धिकरण में निर्मित हुवा , जिसके उत्थान में #ब्राह्मणों ने अतुलनीय सहयोग दिया।

#बौद्ध धर्म में प्रचलित सभी 27 बुद्ध सनातन वेद #वेदज्ञ एवम सांगोपांग वेदों के ज्ञात थे, बौद्ध धर्म से #सम्बंधित सभी शास्त्रो की रचना इसी ब्राह्मण #समाज द्वारा हुई , तथापि बौद्ध दर्शन के #अधिकांश विद्वान् एव चिंतक ब्राह्मण ही थे।

#भगवान बुद्ध का प्रथम शिष्य मौद्गलायन, #बुद्धघोष, बुद्धपालित, दिग्नाग ब्राह्मण ही थे #जिन्होंने बौद्ध दर्शन के सवर्धन में अतुलनीय योगदान दिया।

बौद्ध धर्म के महायान के सस्थापक वसुवन्धु , महाकश्यप , शारिपुत्र,

थेरवाद बुद्धिज्म के स्थापक नागार्जुन, अश्वघोष, नंदीश्वर आदि ब्राह्मण ही थे।

बज्रयान बौद्धिजम के सथापक आचार्य बुद्धघोष, तिब्बतन बुद्धिज्म के सस्थापक पधमसम्भाव, चीनी कुंग फु तथा झेन बौद्धिजम के संस्थापक शान्तिदेव, बौद्धिधर्म, कुमारजीव ,

मिलिंद प्रश्न के विद्वान नागसेन , सम्राट अशोक के गुरु मंजुश्री, नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य आर्यदेव , शांतिरक्षित ,असंग,असंगभद्र आदि सभी बौद्ध विद्वान् ब्राह्मण ही थे जिन्होंने बुद्ध के दर्शन को नवीनता प्रदान की एव उसे संरक्षित किया।

इसके आलावा प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् चन्द्रकीर्ति , धर्मकीर्ति, भावविवेक , गुणमति आदि भी ब्राह्मण ही थे जो हजारो शिष्यो वाले गुरुकुल के कुलपति थे।

इतना ही नही गौतम बुद्ध से पूर्व 27 बौद्धों में से

दीपांकर, मंगल, रैवत, अनामदर्शी, क्रकुछ्न्द , कोणागमन और कश्यप बुद्ध ब्राह्मण ही थे। अन्य क्षत्रिय थे। ये जानकारी हम नही दे रहे स्वयं बौद्ध ग्रंथो से ही प्राप्त होती है। महावंस के साथ सभी बौद्ध ग्रन्थ इस बात के पर्याप्त सबूत देते है की बुद्ध के बाद बुद्ध की शिक्षाओ और उनकी परमिताओ को सहेजने का कार्य इन्ही ब्राह्मणों ने किया जिन्हें आज हम पानी पी पी कर गलिया बकते है। जबकि सत्य स्वीकारे तो अगर बुद्ध के धर्म से ब्राह्मणों को निकाल दे और उनके योगदान को बहार फेक दे तो बुद्ध और उनके धर्म के वजूद में कुछ भी नही बचता।

और मैं नही समझता की ब्राह्मणों ने बुद्ध का कही कोई अहित किया। अगर बुद्ध का कही कोई अहित हुवा तो सम्राट अशोक के बाद चावार्क दर्शन के प्रभाव में नास्तिको ने बुद्ध के सिद्धान्तों और चावार्क दर्शन को मिला कर भ्रमित बौद्धिजम बनाया जिसने दर्शन के मूल भुत बिन्दुओ को निगल लिया और सिर्फ वही रह गया जो ये व्यभिचारी नास्तिको ने चाहा ।

हमारा समाज कभी इस बिंदु पर विचार क्यों नही करता की क्या वो वास्तव में बुद्ध को समझता है उनको मानता है या बस भेड़ चाल है पता कुछ नही पढ़ा कुछ नही बस सूना और लगे चिल्लाने।

मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ की पुष्यमित्र शुंग ने हमारे सम्राट वृहद्रथ की हत्या की मगर हम ये क्यों नही मानते की हम इतने अक्षम और अयोग्य क्यों हो गए । तलवार गर्दन काटती है क्यों की उसका काम है काटना मगर गर्दन अपनी गलती क्यों नही मानती की वो इतनी कमजोर क्यों हो गई की उसे कटना पड़ा।

और सिर्फ अगर यही आधार है ब्राह्मणों को शत्रु समझने और उनको गरियाने का तो फिर हम चन्द्रगुप्त मौर्य के परिवार को तबाह करने वाले


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