#मौर्य_____________
#मैं बताना चाहूँगा बुद्ध और उनके वंश को तथा #घृणा की राजनीती करने वाले लोगो के उस तथ्य #को जिसको बेबुनियाद ये गालिया बकते है।
#ऋषि कश्यप के वंशज मनुस्मृति वाले मनु #महाराज थे, राम ,लक्ष्मण थे।
#इसी सूर्यवंश में शाक्य के शुद्योधन थे जिनके पुत्र #थे ।
#भगवान बुद्ध , वस्तुतः मनुस्मृति वाले मनु से #लेकर बुद्ध तक सभी एक ही शृंखला सूर्यवंश के #थे। जबकि गालिया खाते है ब्राह्मण , जो की #घोर अज्ञानता का परिचायक है मनुस्मृति के #रचना कार स्वयं बुद्ध के पूर्वज थे और मनुस्मृति #के लिए मनु को गालिया बकने वाले आधुनिक #बौद्ध वादी , क्या इनको वास्तव में इतिहास का पता है क्या ये वास्तव में तथ्यों और ऐतिहासिक परिदृश्यों पर सच्चा अध्ययन करते है ।
सायद नही आगर ऐसा होता तो आज स्वयं को बुद्ध का अनुवाई बताने वाले बुद्ध के ही पूर्वजो को गालिया नही बकते।
इतना ही नही ये गालिया बकने वाले लोगो से पूछिये वास्तव में इन्होंने बुद्ध और उनके धर्म के लिए क्या किया है तो भर से भाग खड़े होंगे और जो खड़े होंगे बोलने वाले वो भक से भीम राव का नाम लेंगे और कहेंगे बाबा के बौद्ध धर्म को जिंन्दा किया। जबकि ऐसा नही बाबा ने बौद्ध धर्म में परिवर्तन किया और उसे स्वयं के अनुकूल बना कर विकृत किया। जिसे जीर्णोद्धार नही हाइजैक कहते है। भीम राव ने बुद्ध को नीज स्वार्थ पूर्ति के लिए हाइजैक किया। इस हाइजैक महिमामंडित करना की बाबा ने बुद्ध और उनके धर्म पर उपकार किया घोर मूर्खता का सबूत है।
#जबकि वास्तव में बुद्ध और उनके धर्म के लिए #जिन्होंने किया वो आज गालिया खाते है ,
#बुद्ध का धर्म वेद सम्मत और सनातन धर्म के #शुद्धिकरण में निर्मित हुवा , जिसके उत्थान में #ब्राह्मणों ने अतुलनीय सहयोग दिया।
#बौद्ध धर्म में प्रचलित सभी 27 बुद्ध सनातन वेद #वेदज्ञ एवम सांगोपांग वेदों के ज्ञात थे, बौद्ध धर्म से #सम्बंधित सभी शास्त्रो की रचना इसी ब्राह्मण #समाज द्वारा हुई , तथापि बौद्ध दर्शन के #अधिकांश विद्वान् एव चिंतक ब्राह्मण ही थे।
#भगवान बुद्ध का प्रथम शिष्य मौद्गलायन, #बुद्धघोष, बुद्धपालित, दिग्नाग ब्राह्मण ही थे #जिन्होंने बौद्ध दर्शन के सवर्धन में अतुलनीय योगदान दिया।
बौद्ध धर्म के महायान के सस्थापक वसुवन्धु , महाकश्यप , शारिपुत्र,
थेरवाद बुद्धिज्म के स्थापक नागार्जुन, अश्वघोष, नंदीश्वर आदि ब्राह्मण ही थे।
बज्रयान बौद्धिजम के सथापक आचार्य बुद्धघोष, तिब्बतन बुद्धिज्म के सस्थापक पधमसम्भाव, चीनी कुंग फु तथा झेन बौद्धिजम के संस्थापक शान्तिदेव, बौद्धिधर्म, कुमारजीव ,
मिलिंद प्रश्न के विद्वान नागसेन , सम्राट अशोक के गुरु मंजुश्री, नालंदा विश्वविद्यालय के आचार्य आर्यदेव , शांतिरक्षित ,असंग,असंगभद्र आदि सभी बौद्ध विद्वान् ब्राह्मण ही थे जिन्होंने बुद्ध के दर्शन को नवीनता प्रदान की एव उसे संरक्षित किया।
इसके आलावा प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् चन्द्रकीर्ति , धर्मकीर्ति, भावविवेक , गुणमति आदि भी ब्राह्मण ही थे जो हजारो शिष्यो वाले गुरुकुल के कुलपति थे।
इतना ही नही गौतम बुद्ध से पूर्व 27 बौद्धों में से
दीपांकर, मंगल, रैवत, अनामदर्शी, क्रकुछ्न्द , कोणागमन और कश्यप बुद्ध ब्राह्मण ही थे। अन्य क्षत्रिय थे। ये जानकारी हम नही दे रहे स्वयं बौद्ध ग्रंथो से ही प्राप्त होती है। महावंस के साथ सभी बौद्ध ग्रन्थ इस बात के पर्याप्त सबूत देते है की बुद्ध के बाद बुद्ध की शिक्षाओ और उनकी परमिताओ को सहेजने का कार्य इन्ही ब्राह्मणों ने किया जिन्हें आज हम पानी पी पी कर गलिया बकते है। जबकि सत्य स्वीकारे तो अगर बुद्ध के धर्म से ब्राह्मणों को निकाल दे और उनके योगदान को बहार फेक दे तो बुद्ध और उनके धर्म के वजूद में कुछ भी नही बचता।
और मैं नही समझता की ब्राह्मणों ने बुद्ध का कही कोई अहित किया। अगर बुद्ध का कही कोई अहित हुवा तो सम्राट अशोक के बाद चावार्क दर्शन के प्रभाव में नास्तिको ने बुद्ध के सिद्धान्तों और चावार्क दर्शन को मिला कर भ्रमित बौद्धिजम बनाया जिसने दर्शन के मूल भुत बिन्दुओ को निगल लिया और सिर्फ वही रह गया जो ये व्यभिचारी नास्तिको ने चाहा ।
हमारा समाज कभी इस बिंदु पर विचार क्यों नही करता की क्या वो वास्तव में बुद्ध को समझता है उनको मानता है या बस भेड़ चाल है पता कुछ नही पढ़ा कुछ नही बस सूना और लगे चिल्लाने।
मैं इस बात को स्वीकार करता हूँ की पुष्यमित्र शुंग ने हमारे सम्राट वृहद्रथ की हत्या की मगर हम ये क्यों नही मानते की हम इतने अक्षम और अयोग्य क्यों हो गए । तलवार गर्दन काटती है क्यों की उसका काम है काटना मगर गर्दन अपनी गलती क्यों नही मानती की वो इतनी कमजोर क्यों हो गई की उसे कटना पड़ा।
और सिर्फ अगर यही आधार है ब्राह्मणों को शत्रु समझने और उनको गरियाने का तो फिर हम चन्द्रगुप्त मौर्य के परिवार को तबाह करने वाले
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